150 Years of Celebrating The Mahatma


Life of Mohandas Karamchand Gandhi Ji ‘BAPU’

गांधीजी की जीवन यात्रा

“जैसा परिवर्तन आप विश्व में चाहते हैं वैसा परिवर्तन पहले स्वयं में करें”


आज से सत्तर वर्ष पूर्व महात्मा गांधी इस दुनिया से विदा हुए किंतु उनके आदर्श उनका जीवन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार आज भी मानव जीवन को अनुप्राणित कर रहे हैं। मानव विकास में उनका योगदान इतना अधिक और विशिष्ट है कि उसकी न तो उपेक्षा की जा सकती है और न कभी भुलाया जा सकता है। आज विश्व उन्हें मानव समाज के एक ऐसे नवोन्मेषी के रूप में याद करता है जैसा मानव समाज पहले कभी नहीं पा सका।

मोहन दास करमचंद गांधी का जीवन मानव जीवन में सत्य और अहिंसा के मूल्यों को स्थापित करने वाले नायक के प्रयत्नों की कहानी है। इस उद्देश्य को अपने जीवन में पूर्णता तक पहुंचाते हुए वे ’मोन्या’ से ’महात्मा’ बने। बीसवीं सदी में हिंसा की आग से घिरे हुए विश्व में वे लोगों के लिये अहिंसा के दूत बने और भारत के राष्ट्रपिता कहलाये। भारत के स्वातंत्र्य आंदोलन में उन्होंने अपने सत्य और अहिंसा के प्रयोग से भारत और ब्रिटेन को आपसी घृणा और बदले की भावना से बचाया। इससे विश्व में अफ्रीका और एशिया के उन देशों में जिन पर उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोपीय देशों ने कब्जा किया था - ऐसा माहौल बना कि वे देश खून खराबे के बिना स्वतंत्र हो सके।

मध्यमवर्गीय वैष्णव परिवार में पैदा होकर व बडे होकर वे अपने परिवार और स्कूल में उसी तरह की वेशभूषा रहन सहन और खानपान में जिए जैसे उस वर्ग के लोग जीते हैं। तत्पश्चात वे अध्ययन हेतु इंग्लैण्ड गए और वहां उसी देश की परिस्थिति एवं वेशभूषा में रहे जैसे वहां के लोग रहते थे। किंतु खानपान एवं कुछ अन्य निश्चित कार्य व्यवहार में वैसे ही निष्ठायुक्त बने रहे जैसा उन्होंने अपने प्रारंभिक जीवन काल में घर पर सीखा था। भारत लौटने के बाद उन्होंने बार में प्रेक्टिस करते हुए वे सारी परेशानियां झेली जो एक सीखने वाले वकील को प्रारंभ में झेलनी पडती है और वे अपने एक मुवक्किल की सहायता हेतु वकील के रूप में साउथ अफ्रीका गए। वहां भारतीयों की स्थिति एवं उनके साथ होने वाले व्यवहार को देखकर उन्हें लगा कि अभी भारत लौटने के बजाए वहीं रहकर उनकी सेवा करनी चाहिये। फलस्वरूप उन्हें अफ्रीका में कई वर्ष रहना पडा। वहां के अधिकारियों के साथ उनके संघर्ष से भारतीयों की स्थिति में उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ और जब वे भारत लौटे तो वे महात्मा के रूप में स्थापित हो चुके थे। भारत में उनका पहनावा बैरिस्टर के रूप में प्रेक्टिस करते हुए पहने जाने वाले पहनावे से भिन्न था। यहां वे पुराने काठियावाडी पहनावे में रहने लगे।

साउथ अफ्रीका में एक रेल्वे टिकट कलेक्टर के व्यवहार ने उनमें एक ’सत्याग्रही’ को जन्म दिया और भारत में चंपारन के एक गरीब किसान राज कुमार शुक्ल ने भारत भूमि पर चंपारन में उनके सत्याग्रह की शक्ति परीक्षण करने का मंच प्रदान किया। उनके असहयोग आंदोलन के अभियान में उनमें एक और परिवर्तन हुआ उनका बाहरी स्वरूप और बदला वे देश के विनम्रतम एवं न्यूनतम अवस्था में रह रहे लोगों की तरह एक लंगोटी मे रहने लगे और अंतिम समय तक अपने होठो पर भगवान के नाम के उच्चारण तक उसी तरह रहे।

अपने असहयोग आंदोलन को जारी रखते हुए वे कई बार जेल गये और देश के पीड़ित, दलित लोगों पर अत्याचार के विरोध में उन्होनें कई बार उपवास किये।

उन्होनें साउथ अफ्रीका में जिस असहयोग आंदोलन के प्रयोग की तकनीक अपनायी उसका विस्तार बाद मे भारत और विश्व के अन्य देशों में भी हुआ।

30 जनवरी, 1948 को एक हत्यारें की गोली ने उनके शारीरिक अस्तित्व को अवश्य खत्म कर दिया किन्तु वे अपनी अमिट धरोहर मानवता के लिए छोड़ गये। –‘मेरा जीवन ही मेरा संदेश है’

Life Journey of Gandhi Ji

“You must be the change you wish to see in the world.”


It has been seventy years since Mahatma Gandhi departed from our midst. But his life and soul continue to animate humanity transcending national and international boundaries. His contribution to human development is far too great and varied to have been forgotten or to be overlooked. The world today recognizes him as a far more compelling social innovator than humanity ever realized.

The life of Mohandas Karamchand Gandhi is a story of heroic effort to establish the values of Truth and Non-violence in human life. In pursuing this objective Gandhiji became a Mahatma from a mere ‘Monya’. He became a messenger, for the people of the world surrounded by fire of violence in the twentieth century. He also became ‘The Father of The Nation’. He saved India and Britain from mutual hate and revenge by resorting to the experiment of Truth and Non-violence in India’s struggle for freedom. This created an atmosphere which made it possible for other countries of Asia and Africa to free themselves without bloodshed from the hold of the European countries which had subdued them in the nineteenth century.

Being born in a middle class Vaishnava family and brought up in that atmosphere till he joined school and received instruction according to the system then prevailing, he lived, dressed and dined in the way all children of that class did. Later, he went to England for studies and changed his dress to suit the conditions of that country. But in food and certain other matters, he remained true to the lesson he had learnt early in life. On his return to India after being called to the Bar, he passed through difficult times as all beginners in the profession of the law have to do and it was as a lawyer that he went to South Africa to help a client. He had, however, to spend many years there as the condition of Indians and the treatment they received demanded that he should serve them rather than return to India. His struggle with the authorities brought about a considerable change in his life and by the time he returned to India, he had already become a Mahatma. His dress in India on his return was different from what he used to wear when he was practicing as a Barrister and conformed to the old Kathiawadi type.

If in South Africa it was the Railway Ticket Collector who paved the way for the birth of a Satyagrahi, in India it was a poor peasant from Champaran, Rajkumar Shukla, who provided him a platform to test the power of Satyagraha on the Indian soil. His campaign in favour of the non-co-operation movement brought about another change which identified his outward appearance with that of the humblest and lowliest of the land and he stuck to the loin cloth till he departed with the name of God on his lips.

Mahatma Gandhi was imprisoned several times in his pursuit of non-cooperation and undertook many ‘fasts’ to protest against the oppression of the down trodden in India.

He invented the techniques of mass –civil disobedience in South Africa which were later emulated in India and across the world.

On January 30th, 1948, the assassin’s bullet ended the physical existence of Mahatma Gandhi and made him immortal who left an indelible legacy to the mankind –‘My life is my Message’.

Timeline

पोरबंदर में मोहनदास, आयु 7 वर्ष ।

Mohandas at Porbandar, Age 7.

कस्तूरबा उन लोगों में सबसे आगे थीं, जिन्हें गांधीजी ने अपने शिक्षक के रूप में देखा था।

Kasturba was in the forefront of those Gandhiji saw as his teacher.

गांधीजी अपने सचिव, सोनिया स्लेसिन और श्री पोलाक के साथ (सामने) ।

Gandhiji with his secretary, Sonia Schlesin, and Mr. Polak in front.

सन् 1915 में गांधीजी के भारत आगमन पर नागरिक अभिनन्दन समारोह ।

Gandhiji at civic reception on his advent to India, 1915.

असहयोग-आंदोलन के दौरान गांधीजी ।

Gandhiji during non-corporation-movement.

गांधीजी चरखे पर सूत कातते हुए, साबरमती आश्रम, 1925

Gandhiji at the wheel, Sabarmati Ashram, 1925.

गांधीजी ने 6 अप्रैल, 1930 को प्राकृतिक नमक की गांठ उठाकर नमक कानून को औपचारिक रूप से तोड़ा ।

Gandhiji ceremoniously breaking the salt law by picking up a lump of natural salt, Dandi, 6 April, 1930.

1931 में लंदन में गोलमेज सम्‍मेलन में गांधीजी ।

Gandhiji at Round table conference in London, 1931.

बिड़ला हाउस में नई सरकार के सदस्यों के साथ गांधीजी ।

Gandhiji in Birla House with members of new Government.

बिड़ला हाउस में गहरी नींद में गांधीजी ।

Gandhiji in deep sleep in Birla House.

गांधीजी की अंतिम यात्रा ।

Last journey of Gandhiji.